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June 7, 2026

Gujarat

🌸 *परिश्रम रूपी जल से खिलता है सफलता का पौधा : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण* 🌸 *-आचार्यश्री ने विद्यार्थियों को ज्ञान प्राप्ति की पांच बाधाओं से बचनने की दी पावन प्रेरणा* *-तेरापंथ किशोर मण्डल ने दी अपनी प्रस्तुति, प्राप्त किया आशीर्वाद* *-समणश्रेणी ने अपने आराध्य के सम्मुख दी अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति* *09.02.2025, रविवार, भुज, कच्छ (गुजरात) :* भारत के पश्चिम क्षेत्र का समृद्ध राज्य गुजरात। उसका सबसे बड़ा जिला कच्छ और कच्छ का एक मुख्य नगर भुज। जहां वर्तमान में जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी विराजमान हैं। भुजवासी अपने आराध्य की ऐसी कृपा को प्राप्त कर भावविभोर बने हुए हैं। नित नूतन कार्यक्रमों से भी भुजवासी अपनी श्रद्धा की प्रणति अर्पित कर रहे हैं। रविवार को कच्छी पूज समवसरण में उपस्थित श्रद्धालु जनता को युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने पावन प्रतिबोध प्रदान करते हुए कहा कि आदमी के जीवन में शिक्षा का बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। शिक्षा के लिए आज सरकार भी कितना प्रयत्न कर रही है। जगह-जगह सरकारी स्कूल, विद्यालय, महाविद्यालय देखने को मिलते हैं तो प्राइवेट स्कूल, कॉलेज आदि भी देखने को मिलते हैं। बच्चे विदेशों में भी पढ़ने के लिए जाते हैं। इसका मतलब है कि शिक्षा के प्रति जागरूकता है, कहीं कमी की बात भी हो सकती है। शिक्षा दो प्रकार की होती है-पहली लौकिक शिक्षा और दूसरी आध्यात्मिक शिक्षा। लौकिक शिक्षा के अंतर्गत कोई डॉक्टर, वकील, इंजीनियर, सीए, प्राध्यापक आदि बनते हैं। लौकिक शिक्षा के द्वारा कोई-कोई अपने क्षेत्र में प्रवीण बन सकता है। हालांकि इनकी भी अपनी उपयोगिता होती है। लौकिक शिक्षा का अपना एक भाग है। शिक्षा का दूसरा भाग है-आध्यात्मिक शिक्षा। इसमें धर्म शास्त्रों की शिक्षा, आत्मा के संदर्भ में शिक्षा, कर्मवाद, लोकवाद आदि-आदि तात्त्विक विषयों पर आधारित शिक्षा की धाराएं आध्यात्मिक शिक्षा के अंतर्गत होती हैं। कोई भी शिक्षा ग्रहण करनी हो, उसके लिए परिश्रम और समर्पण की आवश्यकता होती है। आदमी को जिस विषय की शिक्षा भी प्राप्त करनी हो उसके लिए परिश्रमशीलता होनी चाहिए। सीखने वाले में प्रतिभा की आवश्यकता और अच्छा आध्यापक/प्रधाध्यापक भी मिल जाए और थोड़ी संसाधनों की उपलब्धता भी हो जाए तो वहां शिक्षा का अच्छा विकास दिखाई दे सकता है। मूल तो विद्यार्थी ही होता है। हालांकि शिक्षक, संसाधन भी अच्छे मिल जाएं तो विद्यावान बना जा सकता है। मूल है कि विद्यार्थी में विद्या ग्रहण करने की इच्छा हो तो विद्यावान बनने का सफर पूरा हो सकता है। सफलता रूपी पौधा परिश्रम रूपी जल का सिंचन मांगता है। इसलिए विद्यार्थी को परिश्रमी होना चाहिए। विद्यार्थी में ज्ञान के प्रति आकर्षण हो, विनय का भाव होता है तो विद्या का विकास हो सकता है। विद्या विनय से शोभित होती है। जो विद्यार्थी विद्या प्राप्ति की अभिलाषा रखते हैं, उन्हें पांच बांधाओं से बचने का प्रयास करना चाहिए। पहली बाधा है-अहंकार। अहंकार से बचने का प्रयास करना चाहिए। दूसरी बाधा है-क्रोध। जिस विद्यार्थी को ज्यादा गुस्सा आता है, वह भी ज्ञान प्राप्ति में बाधा है। तीसरी बाधा है-प्रमाद। विद्यार्थी को प्रमाद से बचने का प्रयास करना चाहिए। चौथी बाधा है-बीमरी। शरीर स्वस्थ होता है तो ज्ञान का अभ्यास अच्छा हो सकता है। पांचवीं बाधा है-आलस्य। अगर विद्यार्थी में आलस्य हो तो भला वह कितना ज्ञान अर्जित करेगा। इसलिए विद्यार्थियों को इन पांच बाधाओं से बचने का प्रयास करना चाहिए और ज्ञानार्जन के क्षेत्र में आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए। आचार्यश्री के मंगल प्रवचन के उपरान्त तेरापंथ किशोर मण्डल-भुज ने अपनी प्रस्तुति दी। आचार्यश्री के मंगल सन्निधि में उपस्थित जीतो एपेक्स के जनरल सेक्रेट्री श्री ललित डांगी ने अपनी भावाभिव्यक्ति देते हुए विश्व नवकार दिवस के संदर्भ में पत्र प्रस्तुत किया तो आचार्यश्री ने सभी को मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। समणी ख्यातिप्रज्ञाजी व समणी निर्मलप्रज्ञाजी ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। 1 min read

🌸 *परिश्रम रूपी जल से खिलता है सफलता का पौधा : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण* 🌸 *-आचार्यश्री ने विद्यार्थियों को ज्ञान प्राप्ति की पांच बाधाओं से बचनने की दी पावन प्रेरणा* *-तेरापंथ किशोर मण्डल ने दी अपनी प्रस्तुति, प्राप्त किया आशीर्वाद* *-समणश्रेणी ने अपने आराध्य के सम्मुख दी अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति* *09.02.2025, रविवार, भुज, कच्छ (गुजरात) :* भारत के पश्चिम क्षेत्र का समृद्ध राज्य गुजरात। उसका सबसे बड़ा जिला कच्छ और कच्छ का एक मुख्य नगर भुज। जहां वर्तमान में जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी विराजमान हैं। भुजवासी अपने आराध्य की ऐसी कृपा को प्राप्त कर भावविभोर बने हुए हैं। नित नूतन कार्यक्रमों से भी भुजवासी अपनी श्रद्धा की प्रणति अर्पित कर रहे हैं। रविवार को कच्छी पूज समवसरण में उपस्थित श्रद्धालु जनता को युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने पावन प्रतिबोध प्रदान करते हुए कहा कि आदमी के जीवन में शिक्षा का बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। शिक्षा के लिए आज सरकार भी कितना प्रयत्न कर रही है। जगह-जगह सरकारी स्कूल, विद्यालय, महाविद्यालय देखने को मिलते हैं तो प्राइवेट स्कूल, कॉलेज आदि भी देखने को मिलते हैं। बच्चे विदेशों में भी पढ़ने के लिए जाते हैं। इसका मतलब है कि शिक्षा के प्रति जागरूकता है, कहीं कमी की बात भी हो सकती है। शिक्षा दो प्रकार की होती है-पहली लौकिक शिक्षा और दूसरी आध्यात्मिक शिक्षा। लौकिक शिक्षा के अंतर्गत कोई डॉक्टर, वकील, इंजीनियर, सीए, प्राध्यापक आदि बनते हैं। लौकिक शिक्षा के द्वारा कोई-कोई अपने क्षेत्र में प्रवीण बन सकता है। हालांकि इनकी भी अपनी उपयोगिता होती है। लौकिक शिक्षा का अपना एक भाग है। शिक्षा का दूसरा भाग है-आध्यात्मिक शिक्षा। इसमें धर्म शास्त्रों की शिक्षा, आत्मा के संदर्भ में शिक्षा, कर्मवाद, लोकवाद आदि-आदि तात्त्विक विषयों पर आधारित शिक्षा की धाराएं आध्यात्मिक शिक्षा के अंतर्गत होती हैं। कोई भी शिक्षा ग्रहण करनी हो, उसके लिए परिश्रम और समर्पण की आवश्यकता होती है। आदमी को जिस विषय की शिक्षा भी प्राप्त करनी हो उसके लिए परिश्रमशीलता होनी चाहिए। सीखने वाले में प्रतिभा की आवश्यकता और अच्छा आध्यापक/प्रधाध्यापक भी मिल जाए और थोड़ी संसाधनों की उपलब्धता भी हो जाए तो वहां शिक्षा का अच्छा विकास दिखाई दे सकता है। मूल तो विद्यार्थी ही होता है। हालांकि शिक्षक, संसाधन भी अच्छे मिल जाएं तो विद्यावान बना जा सकता है। मूल है कि विद्यार्थी में विद्या ग्रहण करने की इच्छा हो तो विद्यावान बनने का सफर पूरा हो सकता है। सफलता रूपी पौधा परिश्रम रूपी जल का सिंचन मांगता है। इसलिए विद्यार्थी को परिश्रमी होना चाहिए। विद्यार्थी में ज्ञान के प्रति आकर्षण हो, विनय का भाव होता है तो विद्या का विकास हो सकता है। विद्या विनय से शोभित होती है। जो विद्यार्थी विद्या प्राप्ति की अभिलाषा रखते हैं, उन्हें पांच बांधाओं से बचने का प्रयास करना चाहिए। पहली बाधा है-अहंकार। अहंकार से बचने का प्रयास करना चाहिए। दूसरी बाधा है-क्रोध। जिस विद्यार्थी को ज्यादा गुस्सा आता है, वह भी ज्ञान प्राप्ति में बाधा है। तीसरी बाधा है-प्रमाद। विद्यार्थी को प्रमाद से बचने का प्रयास करना चाहिए। चौथी बाधा है-बीमरी। शरीर स्वस्थ होता है तो ज्ञान का अभ्यास अच्छा हो सकता है। पांचवीं बाधा है-आलस्य। अगर विद्यार्थी में आलस्य हो तो भला वह कितना ज्ञान अर्जित करेगा। इसलिए विद्यार्थियों को इन पांच बाधाओं से बचने का प्रयास करना चाहिए और ज्ञानार्जन के क्षेत्र में आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए। आचार्यश्री के मंगल प्रवचन के उपरान्त तेरापंथ किशोर मण्डल-भुज ने अपनी प्रस्तुति दी। आचार्यश्री के मंगल सन्निधि में उपस्थित जीतो एपेक्स के जनरल सेक्रेट्री श्री ललित डांगी ने अपनी भावाभिव्यक्ति देते हुए विश्व नवकार दिवस के संदर्भ में पत्र प्रस्तुत किया तो आचार्यश्री ने सभी को मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। समणी ख्यातिप्रज्ञाजी व समणी निर्मलप्रज्ञाजी ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी।

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* सुरेंद्र मुनोत, ऐसोसिएट एडिटर Key Line Times भुज, कच्छ (गुजरात),ग्यारह वर्षों बाद भुज की धरा पर पधारे जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान...
सुरेंद्र मुनोत, ऐसोसिएट एडिटर Key Line Time भुज, कच्छ (गुजरात) ,भुज की धरा पर गुजरात का प्रथम और तेरापंथ धर्मसंघ का 161वां मर्यादा महोत्सव...
राजेश एल पंवार डांग,डांग अहवा मुख्यालय में पार्किंग की समस्या का समाधान कौन करेगा ? इसमें कोई संदेह नहीं है कि ट्रैफिक को सुचारू...
* सुरेंद्र मुनोत, ऐसोसिएट एडिटर Key Line Times भुज, कच्छ (गुजरात) ,जैन आगम में अठारह पाप बताए गए हैं। इनमें दूसरा पाप है-मृषावाद अर्थात्...
* सुरेंद्र मुनोत, ऐसोसिएट एडिटर Key Line Times भुज, कच्छ (गुजरात) ,गुजरात के भुज-कच्छ मंे तेरापंथ धर्मसंघ का प्रथम मर्यादा महोत्सव व तेरापंथ धर्मसंघ...
सुरेंद्र मुनोत, ऐसोसिएट एडिटर Key Line Times भुज कच्छ (गुजरात) ,भुज की धरा पर गुजरात का प्रथम तथा जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ का 161वां...
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इन्द्रियों के संयम व सदुपयोग से जीवन को बनाएं सुफल : महातपस्वी महाश्रमण* 🌸 *-शांतिदूत के नागरिक अभिनन्दन में जुटे भुज के अनेकों गणमान्य* *-विधायक, नगराध्यक्ष आदि सहित अनेक गणमान्यों ने दी अभिव्यक्ति व प्राप्त किया आशीर्वाद* *-नगर में स्थापित हो सद्भावना, नैतिकता व नशामुक्ति की सूत्रत्रयी : आचार्यश्री महाश्रमण* *01.02.2025, शनिवार, भुज, कच्छ (गुजरात) :* जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी गुजरात के प्रथम ‘मर्यादा महोत्सव के लिए भुज में विराजमान हो चुके हैं। अपने आराध्य की मंगल सन्निधि में मर्यादा के इस महामहोत्सव को मनाने के लिए साधु, साध्वियां, समणियां, मुमुक्षु बाइयां तथा हजारों की संख्या में श्रावक-श्राविकाएं भी भुज में पहुंच रहे हैं। आचार्यश्री से इस सौभाग्य को प्राप्त कर भुजवासी हर्षविभोर बने हुए हैं। शनिवार को सूर्योदय से पूर्व ही आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में सैंकड़ों की संख्या में श्रद्धालु उपस्थित थे। प्रातःकाल के मंगलपाठ आदि के बाद भी मानों श्रद्धालु अपने सुगुरु की सन्निधि को छोड़ने का नाम ही नहीं ले रहे थे। भुज का पूरा वातावरण भक्ति, आस्था, उत्साह के रंग में रंगा हुआ दिखाई दे रहा है। ‘कच्छी पूज समवसरण’ में निर्धारित समय पर तेरापंथाधिशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी के मंचासीन होने से पूर्व ही श्रद्धालुओं की उपस्थिति प्रवचन पण्डाल खचाखच भर चुका था। आज भुज नगर की ओर से आचार्यश्री के नागरिक अभिनंदन का उपक्रम भी समायोजित था। तीर्थंकर के प्रतिनिधि आचार्यश्री महाश्रमणजी ने समुपस्थित जनता को अपनी अमृतवाणी से पावन प्रतिबोध प्रदान करते हुए कहा कि एक आगम में इन्द्रियों व मन के बारे में एक विशद विश्लेषण प्राप्त होता है। मनुष्य शरीर में पांच ज्ञानेन्द्रियां होती हैं। पांच कर्मेन्द्रियां भी होती हैं। ज्ञानेन्द्रियों से आदमी को ज्ञान प्राप्त होता है। ज्ञानेन्द्रियां भोग में भी काम आती हैं। इसमें श्रोत्रेन्द्रिय एक ज्ञानेन्द्रिय है। कान के माध्यम से आदमी सुनता है और सुनकर आदमी ज्ञान प्राप्त करता है। चक्षुरेन्द्रिय आदमी देखता है और उससे ज्ञान प्राप्त करता है। नाक से सूंघकर गंध की जानकारी करते हैं। जिह्वा से आदमी रस आदि की जानकारी करता है। स्पर्श (त्वचा) के द्वारा स्पर्श का ज्ञान होता है। ये इन्द्रियां मानव जीवन के लिए अति महत्त्वपूर्ण हैं। बाह्य जगत की जानकारी में मानव की सहायता इन्द्रियां करती हैं। पांच इन्द्रियों वाला प्राणी विकसीत होता है। भीतरी जगत के ज्ञान में भी इन्द्रियां सहायक बनती हैं, किन्तु भीतरी ज्ञान मूलतः चेतना से प्राप्त होता है। मानव जीवन के मूल दो तत्त्व शरीर और आत्मा। पूरी दुनिया में चेतन और अचेतन में समाहित होती है। आत्मा और शरीर का मिश्रण जीवन है और आत्मा और शरीर का वियोग मृत्यु और आत्मा तथा शरीर का हमेशा के लिए वियोग हो जाना मोक्ष होता है। मानव जीवन को दुर्लभ बताया गया है। 84 लाख जीव योनियों में मनुष्य जन्म प्राप्त कर लेना कठिन होता है। आदमी को इस दुर्लभ मानव जीवन का सदुपयोग करने का प्रयास करना चाहिए। यह जीवन शाश्वत नहीं है, इसकी एक सीमा होती है तो आदमी को इसका अच्छे से अच्छा उपयोग करने का प्रयास करना चाहिए। यह मानव जीवन अनिश्चित है तो आदमी को ऐसा कार्य करना चाहिए कि आदमी दुर्गति में न जाए। इसके लिए शास्त्र में एक प्रेरणा दी गई कि आदमी को अपनी इन्द्रियों का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए बल्कि इनका समुचित सदुपयोग करने का प्रयास करना चाहिए और इन्द्रिय विषयों में राग-द्वेष करने से बचने का प्रयास करना चाहिए। यह समता की साधना पुष्ट होती है तो मानव जीवन सुफल बन सकता है। मानव जीवन में सादगी हो और विचार ऊंचे हों तो आदमी के जीवन की बहुत बड़ी संपदा होती है। पैसे की उपयोगिता इस जीवन तक हो सकती है, किन्तु धर्म की पूंजी आगे के जीवन में भी काम आती है। इसलिए आदमी को अपनी इन्द्रियों का संयम और सदुपयोग करने का प्रयास करना चाहिए। आचार्यश्री ने आगे कहा कि हमारे भुज आगमन और प्रवास का संबंध मर्यादा महोत्सव से जुड़ा हुआ है। मर्यादा महोत्सव इसलिए होता है कि नियम और विधान के प्रति निष्ठा रहे। इस प्रकार के संस्कारों को संपोषित करने में यह समय और महोत्सव सहायक बन सकती है। जीवन में अनुशासन-मर्यादा रहे और इन्द्रियों का संयम रहे, यह काम्य है। आचार्यश्री के मंगल प्रवचन के उपरान्त मुख्यमुनिश्रीे महावीरकुमारजी ने भी समुपस्थित जनता को उत्प्रेरित किया। आचार्यश्री के नागरिक अभिनंदन समारोह में सर्वप्रथम कच्छ जिला के कलेक्टर श्री अमित अरोड़ा ने अपनी भावाभिव्यक्ति देते हुए कहा कि मैं पूरे जिले की ओर से आचार्यश्री का खूब-खूब स्वागत करता हूं। भुज की नगराध्यक्ष श्रीमती रश्मिबेन सोलंकी, भुज के विधायक श्री केशु भाई पटेल, पूर्व विधायक श्री पंकजभाई मेहता, गुजरात विधानसभा की पूर्व अध्यक्ष श्रीमती निमाबेन आचार्य, बुलियन मर्चेंट एसोसिएशन के अध्यक्ष श्री भद्रेश भाई दोसी व चेम्बर्स ऑफ कॉमर्स के अध्यक्ष श्री अनिल भाई गौर ने शांतिदूत के स्वागत में अपनी-अपनी श्रद्धाभिव्यक्ति दी। उपस्थित समस्त गणमान्यों ने शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी को भुज नगर की प्रतीकात्मक चाबी अर्पित की। इस संदर्भ में आचार्यश्री ने आशीर्वाद प्रदान करते हुए कहा कि हमारे जीवन में मर्यादा का बहुत महत्त्व है। इस चाबी के साथ सम्मान का प्रतीक है। सद्भावना, नैतिकता और नशामुक्ति ऐसी सूत्रत्रयी है, जिसके माध्यम से नगर में सर्वत्र सौहार्द रह सकता है। मर्यादा महोत्सव व्यवस्था समिति के महामंत्री श्री शांतिलाल जैन, श्री प्रभुभाई मेहता ने भी अपनी हर्षाभिव्यक्ति दी 1 min read

इन्द्रियों के संयम व सदुपयोग से जीवन को बनाएं सुफल : महातपस्वी महाश्रमण* 🌸 *-शांतिदूत के नागरिक अभिनन्दन में जुटे भुज के अनेकों गणमान्य* *-विधायक, नगराध्यक्ष आदि सहित अनेक गणमान्यों ने दी अभिव्यक्ति व प्राप्त किया आशीर्वाद* *-नगर में स्थापित हो सद्भावना, नैतिकता व नशामुक्ति की सूत्रत्रयी : आचार्यश्री महाश्रमण* *01.02.2025, शनिवार, भुज, कच्छ (गुजरात) :* जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी गुजरात के प्रथम ‘मर्यादा महोत्सव के लिए भुज में विराजमान हो चुके हैं। अपने आराध्य की मंगल सन्निधि में मर्यादा के इस महामहोत्सव को मनाने के लिए साधु, साध्वियां, समणियां, मुमुक्षु बाइयां तथा हजारों की संख्या में श्रावक-श्राविकाएं भी भुज में पहुंच रहे हैं। आचार्यश्री से इस सौभाग्य को प्राप्त कर भुजवासी हर्षविभोर बने हुए हैं। शनिवार को सूर्योदय से पूर्व ही आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में सैंकड़ों की संख्या में श्रद्धालु उपस्थित थे। प्रातःकाल के मंगलपाठ आदि के बाद भी मानों श्रद्धालु अपने सुगुरु की सन्निधि को छोड़ने का नाम ही नहीं ले रहे थे। भुज का पूरा वातावरण भक्ति, आस्था, उत्साह के रंग में रंगा हुआ दिखाई दे रहा है। ‘कच्छी पूज समवसरण’ में निर्धारित समय पर तेरापंथाधिशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी के मंचासीन होने से पूर्व ही श्रद्धालुओं की उपस्थिति प्रवचन पण्डाल खचाखच भर चुका था। आज भुज नगर की ओर से आचार्यश्री के नागरिक अभिनंदन का उपक्रम भी समायोजित था। तीर्थंकर के प्रतिनिधि आचार्यश्री महाश्रमणजी ने समुपस्थित जनता को अपनी अमृतवाणी से पावन प्रतिबोध प्रदान करते हुए कहा कि एक आगम में इन्द्रियों व मन के बारे में एक विशद विश्लेषण प्राप्त होता है। मनुष्य शरीर में पांच ज्ञानेन्द्रियां होती हैं। पांच कर्मेन्द्रियां भी होती हैं। ज्ञानेन्द्रियों से आदमी को ज्ञान प्राप्त होता है। ज्ञानेन्द्रियां भोग में भी काम आती हैं। इसमें श्रोत्रेन्द्रिय एक ज्ञानेन्द्रिय है। कान के माध्यम से आदमी सुनता है और सुनकर आदमी ज्ञान प्राप्त करता है। चक्षुरेन्द्रिय आदमी देखता है और उससे ज्ञान प्राप्त करता है। नाक से सूंघकर गंध की जानकारी करते हैं। जिह्वा से आदमी रस आदि की जानकारी करता है। स्पर्श (त्वचा) के द्वारा स्पर्श का ज्ञान होता है। ये इन्द्रियां मानव जीवन के लिए अति महत्त्वपूर्ण हैं। बाह्य जगत की जानकारी में मानव की सहायता इन्द्रियां करती हैं। पांच इन्द्रियों वाला प्राणी विकसीत होता है। भीतरी जगत के ज्ञान में भी इन्द्रियां सहायक बनती हैं, किन्तु भीतरी ज्ञान मूलतः चेतना से प्राप्त होता है। मानव जीवन के मूल दो तत्त्व शरीर और आत्मा। पूरी दुनिया में चेतन और अचेतन में समाहित होती है। आत्मा और शरीर का मिश्रण जीवन है और आत्मा और शरीर का वियोग मृत्यु और आत्मा तथा शरीर का हमेशा के लिए वियोग हो जाना मोक्ष होता है। मानव जीवन को दुर्लभ बताया गया है। 84 लाख जीव योनियों में मनुष्य जन्म प्राप्त कर लेना कठिन होता है। आदमी को इस दुर्लभ मानव जीवन का सदुपयोग करने का प्रयास करना चाहिए। यह जीवन शाश्वत नहीं है, इसकी एक सीमा होती है तो आदमी को इसका अच्छे से अच्छा उपयोग करने का प्रयास करना चाहिए। यह मानव जीवन अनिश्चित है तो आदमी को ऐसा कार्य करना चाहिए कि आदमी दुर्गति में न जाए। इसके लिए शास्त्र में एक प्रेरणा दी गई कि आदमी को अपनी इन्द्रियों का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए बल्कि इनका समुचित सदुपयोग करने का प्रयास करना चाहिए और इन्द्रिय विषयों में राग-द्वेष करने से बचने का प्रयास करना चाहिए। यह समता की साधना पुष्ट होती है तो मानव जीवन सुफल बन सकता है। मानव जीवन में सादगी हो और विचार ऊंचे हों तो आदमी के जीवन की बहुत बड़ी संपदा होती है। पैसे की उपयोगिता इस जीवन तक हो सकती है, किन्तु धर्म की पूंजी आगे के जीवन में भी काम आती है। इसलिए आदमी को अपनी इन्द्रियों का संयम और सदुपयोग करने का प्रयास करना चाहिए। आचार्यश्री ने आगे कहा कि हमारे भुज आगमन और प्रवास का संबंध मर्यादा महोत्सव से जुड़ा हुआ है। मर्यादा महोत्सव इसलिए होता है कि नियम और विधान के प्रति निष्ठा रहे। इस प्रकार के संस्कारों को संपोषित करने में यह समय और महोत्सव सहायक बन सकती है। जीवन में अनुशासन-मर्यादा रहे और इन्द्रियों का संयम रहे, यह काम्य है। आचार्यश्री के मंगल प्रवचन के उपरान्त मुख्यमुनिश्रीे महावीरकुमारजी ने भी समुपस्थित जनता को उत्प्रेरित किया। आचार्यश्री के नागरिक अभिनंदन समारोह में सर्वप्रथम कच्छ जिला के कलेक्टर श्री अमित अरोड़ा ने अपनी भावाभिव्यक्ति देते हुए कहा कि मैं पूरे जिले की ओर से आचार्यश्री का खूब-खूब स्वागत करता हूं। भुज की नगराध्यक्ष श्रीमती रश्मिबेन सोलंकी, भुज के विधायक श्री केशु भाई पटेल, पूर्व विधायक श्री पंकजभाई मेहता, गुजरात विधानसभा की पूर्व अध्यक्ष श्रीमती निमाबेन आचार्य, बुलियन मर्चेंट एसोसिएशन के अध्यक्ष श्री भद्रेश भाई दोसी व चेम्बर्स ऑफ कॉमर्स के अध्यक्ष श्री अनिल भाई गौर ने शांतिदूत के स्वागत में अपनी-अपनी श्रद्धाभिव्यक्ति दी। उपस्थित समस्त गणमान्यों ने शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी को भुज नगर की प्रतीकात्मक चाबी अर्पित की। इस संदर्भ में आचार्यश्री ने आशीर्वाद प्रदान करते हुए कहा कि हमारे जीवन में मर्यादा का बहुत महत्त्व है। इस चाबी के साथ सम्मान का प्रतीक है। सद्भावना, नैतिकता और नशामुक्ति ऐसी सूत्रत्रयी है, जिसके माध्यम से नगर में सर्वत्र सौहार्द रह सकता है। मर्यादा महोत्सव व्यवस्था समिति के महामंत्री श्री शांतिलाल जैन, श्री प्रभुभाई मेहता ने भी अपनी हर्षाभिव्यक्ति दी

    सुरेंद्र मुनोत, ऐसोसिएट एडिटर Key Line Times भुज, कच्छ (गुजरात) जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री...
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