surendra Munot Associate Editor all india
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लाडनूं ,तेरापंथ की राजधानी के रूप में विख्यात लाडनूं नगर में स्थित जैन विश्व भारती परिसर में जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के देदीप्यमान महासूर्य, युगप्रधान अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी अपनी विशाल धवल सेना के साथ योगक्षेम वर्ष का मंगल प्रवास सुसम्पन्न कर रहे हैं। आचार्यश्री के विराजमान होने के साथ ही तेरापंथ धर्मसंघ की विभिन्न संस्थाओं आदि के सम्मेलन, शिविर, संगोष्ठी आदि के साथ-साथ तेरापंथ धर्मसंघ के विभिन्न धार्मिक आयोजनों के कारण जैन विश्व भारती ही नहीं, पूरा लाडनूं नगर गुलजार बना हुआ है।
इसी क्रम में शुक्रवार को युगप्रधान अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में तेरापंथ धर्मसंघ की ‘संस्था शिरोमणि’ जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा द्वारा आयोजित त्रिदिवसीय तेरापंथी सभा प्रतिनिधि सम्मेलन में भव्य एवं आध्यात्मिक आगाज हुआ। इस सम्मेलन में देश-विदेश के करीब 606 क्षेत्रों से 2000 से अधिक प्रतिनिधि अपने आराध्य की मंगल सन्निधि में संभागी के रूप में पहुंचे हुए हैं। संभागियों ने सर्वप्रथम महासभा के पदाधिकारियों के साथ महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी से मंगलपाठ का श्रवण कर इस विराट सम्मेलन का शुभारम्भ किया।
सुधर्मा सभा में नित्य की भांति आयोजित प्रातःकालीन मंगल प्रवचन में चतुर्विध धर्मसंघ के साथ महासभा के पदाधिकारियों व सम्मेलन के संभागियों की विराट उपस्थिति के कारण मानों विशाल प्रवचन पण्डाल भी जनाकीर्ण नजर आ रहा था। तेरापंथाधिशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आज के निर्धारित विषय ‘गर्हा से क्या मिलेगा?’ को आगम के माध्यम से व्याख्यायित करते हुए कहा कि प्रश्न किया गया कि गर्हा करने से जीव क्या प्राप्त करता है? प्रतिक्रमण के दौरान निन्दा-गर्हा की जाती है। अपने निर्धारित आचार से अनाचार में प्रस्थान कर देना भी दोष माना गया है। स्वयं के आचार, स्वयं की आत्मा में लौट आना प्रतिक्रमण कहलाता है। प्रतिक्रमण करने का विधान तो मानों बाहर महीने के लिए होती है। साधु तो प्रतिदिन दोनों समय में प्रतिक्रमण करने वाले होते हैं। यह चारित्रात्माओं के लिए करणीय ही होता है। प्रतिक्रमण दोनों समय हो जाए तो बहुत अच्छी बात हो सकती है। गृहस्थों में भी प्रतिक्रमण तो प्रायः प्रतिदिन करने के लिए होती है। गृहस्थ रोज नहीं कर पाते तो पर्युषण के दौरान तो करते ही हैं और करना भी चाहिए।
दूसरों के समक्ष अपनी गलती को स्वीकार कर लेने को गर्हा कहा जाता है। अपनी गलती को सबके सामने स्वीकार कर लेना बहुत अच्छी बात होती है। यहां बताया गया कि गर्हा करने से जीवन अपुरस्कार को प्राप्त करता है। परिषद के बीच में आगे लाना और उन्हें सम्मानित करना पुरस्कार होता है। आगमकार ने बताया कि गर्हा करने से जीव अपुरस्कार को प्राप्त करता है और वह स्वयं को दोषों से निवृत्त हो जाता है और शुभ योग को प्राप्त कर लेता है तथा अनंत घाति पर्यवों का क्षय कर लेता है। इस प्रकार गर्हा करने से आत्मा दोष से निर्दोष की ओर जा सकती है। इस दौरान आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं को भी उत्तरित किया।
कार्यक्रम के दौरान युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी की कृति ‘करें स्वयं का योगक्षेम’ को जैन विश्व भारती आदि के पदाधिकारियों द्वारा आचार्यश्री के समक्ष लोकार्पित किया गया। इस संदर्भ में आचार्यश्री ने मंगल प्रेरणा प्रदान की। मुमुक्षु ख्याति ने आचार्यश्री के समक्ष अपनी अभिव्यक्ति दी।
आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में महासभा द्वारा आयोजित ‘तेरापंथी सभा प्रतिनिधि सम्मेलन का मंचीय उपक्रम भी आयोजित हुआ। इस संदर्भ में महासभा के प्रधान न्यासी श्री सुरेशचन्द गोयल तथा महासभा के अध्यक्ष श्री महेन्द्र नाहटा ने अपनी अभिव्यक्ति दी। महासभा के पदाधिकारी व उपस्थित प्रतिनिधियों ने इस दौरान युवाचार्यश्री महावीरजी की वर्धापना की।
तेरापंथाधिशास्ता युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने उपस्थित प्रतिनिधियों को पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि आज तेरापंथी सभा प्रतिनिधि सम्मेलन आयोजित हो रहा है। तेरापंथी महासभा का आयोजक्तव है। जैसे मां-बेटा एक-दूसरे से जुड़े हुए होते हैं, वैसे ही महासभा व सभाएं एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। महासभा शताधिक वर्ष की उम्र वाली संस्था है। हमने जब महासभा को संस्था शिरोमणि का दर्जा दिया था। महासभा की इतनी गतिविधियां हैं और महासभा का समाज के प्रति कर्त्तव्य और दायित्व है, इस दृष्टि से वह संस्था शिरोमणि हो सकती है। तेरापंथी गृहस्थों की दृष्टि से महासभा का बहुत बड़ा दायित्व है। दायित्व का निर्वाह करना विशेष बात होती है। महासभा को मैं आकलित करता हूं तो महासभा अपने दायित्व के प्रति काफी जागरूक दिखाई देती है। आचार्यश्री ने ज्ञानशाला, उपासक श्रेणी, सेवा साधक श्रेणी आदि अनेक आयामों में महासभा व सभा के करणीय कार्यों का वर्णन करते हुए कहा कि सभी प्रतिनिधियों में देव, गुरु और धर्म के प्रति श्रद्धा बनी रहे। इतनी बड़ी संख्या में प्रतिनिधियों का उपस्थित होना बहुत बड़ी बात होती है। समाज की धार्मिक-आध्यात्मिक उन्नति होती रहे। समाज का मानों भाग्य है कि तेरापंथी महासभा जैसी संस्था उसे प्राप्त है। इस कार्यक्रम का संचालन महासभा के महामंत्री श्री विनोद बैद ने किया। आचार्यश्री से मंगल आशीर्वाद व पावन प्रेरणा प्राप्त कर संभागी प्रतिनिधि अतिशय आह्लादित थे।

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