surendra Munot, Associate Editor all india
Key Line Times
17.07.2026, शुक्रवार, लाडनूं ,जन-जन के मानस को आध्यात्मिक अभिसिंचन प्रदान करने वाले, जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान देदीप्यमान महासूर्य, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने शुक्रवार को प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में उर्पिस्थत चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय ‘बुढ़ापा, मृत्यु से कैसे बचें?’ को आगम के माध्यम से वर्णित करते हुए कहा कि इस संसार के पानी के वेग में प्राणी बहा चला जा रहा है, ऐसे में उनके लिए शरण क्या है? गति क्या है? प्रतिष्ठा क्या है? और द्वीप किसे कहा गया है?
उत्तर में बताया गया है कि बुढ़ापा और मृत्यु यह एक प्रकार का महाउदक है और इसका वेग है और इसमें प्राणी बहते जा रहे हैं। आज तक प्रत्येक जीव ने अनंत बार मृत्यु को प्राप्त कर लिया है। जीव के जीवन में बुढ़ापा भी आता है। शरीर के समस्त कष्ट जरा के अंतर्गत आते हैं। बुढ़ापा सभी जीवों को मिले या न मिले, मृत्यु को सभी को प्राप्त होनी है। बुढ़ापा और मृत्यु के वेग में बहते प्राणियों के लिए धर्म एक द्वीप है और इस द्वीप पर बुढ़ापा और मृत्यु का वेग नहीं पहुंच पाता। ऐसी स्थिति को प्रदान करने वाला तत्त्व धर्म है और धर्म ही शरण बनता है।
धन से मृत्यु से छुटकारा नहीं मिल सकता। मृत्यु से छुटकारा दिलाने वाला भी तत्त्व धर्म ही है। धर्म से ही साधु, सिद्ध और अर्हत बनते हैं। इसलिए धर्म ही उत्तम शरण है। आदमी को धर्म की आराधना-साधना करने का प्रयास करना चाहिए। जीवन में धर्म आ जाए तो जीवन का उद्धार हो सकता है। आदमी को अपना जीवन धर्ममय बनाने का प्रयास करना चाहिए।
जो साधु लोग होते हैं, जो भौतिक सुविधाओं का त्याग कर कठोर जीवन जीते हैं, उनके जीवन में प्रसन्नता दिखाई दे सकती है और भौतिक सुविधाओं से ओतप्रोत लोगों के चेहरे पर वैसी प्रसन्नता नहीं देखी जा सकती। साधना का जीवन जीने वाले लोग अतीत की स्मृतियां नहीं करते और भविष्य की चिंता भी करते, वे वर्तमान में जीवन जीने वाले होते हैं। वे किसी बात की चिंता नहीं करते, वे चिंतन करने वाले होते हैं। धर्म, ध्यान, साधना, आराधना के द्वारा अपनी आत्मा के कल्याण का प्रयास होना चाहिए। वर्तमान में संतोष करने का प्रयास करना चाहिए। वर्तमान में जीवन जीने का प्रयास करना चाहिए और धर्म की शरण लेने वाला परम आनंद को प्राप्त हो सकता है।
नित्य की भांति मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं को अपनी जिज्ञासा प्रस्तुत करने का अवसर प्रदान किया। आचार्यश्री की अनुज्ञा से चारित्रात्माओं ने अपनी जिज्ञासा प्रस्तुत की तो आचार्यश्री ने उन जिज्ञासाओं को उत्तरित किया।

रिनिया बालाजी मंदिर के पास आराध्यम का हुआ लोकार्पण,जीवराज सिंह गोगादेव दिवाकर गो शाला 