व्यक्ति अपने परिवार में, समाज अपने समुदाय में और राष्ट्र दूसरे राष्ट्र के प्रति वैर कम करने का प्रयास करें, तो शांति केवल राजनीतिक समझौता नहीं रहेगी; वह मानवीय संस्कृति बनेगी
।
यही भगवान महावीर की अहिंसक दृष्टि की समकालीन प्रासंगिकता है।
क्षमायाचना सिर्फ एक दिन का पर्व नहीं बल्कि यह जीवन-दृष्टि है।
इस पावन क्षमायाचना पर्व पर मेरे मन, वचन या काया से जाने-अनजाने किसी को ठेस पहुँची हो, तो मैं हृदय से बारम्बार खमत खामणा करती हूँ।
अंत मे यही कहना चाहूंगी क्षमा की वैश्विक स्वीकार्यता में ही इस पर्व की सच्ची सार्थकता है।
*मित्ती मे सव्वभूएसु, वेरं मज्झं न केणइ*।
सभी जीवों के प्रति मेरी मैत्री हो और किसी के प्रति मेरा वैर न हो।
क्षमा मन को निर्मल करे, मैत्री जीवन को सुंदर बनाए और अहिंसा पूरे विश्व को शांतिमय बनाए।
द्वारा
डॉ कुसुम लुनिया
9891947000

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