surendra Munot Associate Editor all india
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लाडनूं ,करीब 37 वर्षों बाद जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ का दूसरा योगक्षेम वर्ष तेरापंथ की राजधानी के रूप में विख्यात लाडनूं नगर में स्थित जैन विश्व भारती परिसर में तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में सानंद गतिमान है। नित नवीन आयोजनों का क्रम भी जारी है। धार्मिक-आध्यात्मिक गतिविधियों से सम्पूर्ण वातावरण अध्यात्ममय बना हुआ है। हजारों-हजारों की संख्या में श्रद्धालु निरंतर अपने आराध्य के निकट सेवा, दर्शन व उपासना का लाभ प्राप्त कर रहे हैं। आचार्यश्री भी चतुर्विध धर्मसंघ को नित नवीन प्रेरणा आगमों के माध्यम से प्रदान कर रहे हैं।
नित्य की भांति मंगलवार को प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में सुधर्मा सभा में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को तेरापंथाधिशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी ने पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि प्रश्न किया गया कि वन्दना से जीव क्या प्राप्त करता है? आगमकार ने उत्तर प्रदान करते हुए कहा कि षड् आवश्यक में तीसरा आवश्यक वन्दना है। पंचपरमेष्ठि वंदना मंे अर्हत, सिद्धों, आचार्यों, उपाध्यायों व साधुओं को वंदन किया गया है। पंचपद वंदना चलती है। गुरु की वंदना भी की जाती है।
वन्दना यदि विधिपूर्वक की जाती है, भक्तिपूर्वक की जाती है तो बहुत ही अच्छी बात होती है। हमारी परंपरा है कि आचार्य जिस दिशा में होते हैं, बहिर्विहारी साधु-साध्वियां उस दिशा में मुंह कर वंदना करते हैं। सामने गुरु न हों तो भी जिस दिशा में गुरु हैं, उस दिशा में मुंह कर वंदना की जाती है। आचार्यश्री ने कहा कि और तो आचार्य भी अपने से रत्नाधिकों को वंदना करते हैं। मैंने आचार्यश्री तुलसी को देखा, वे रत्नाधिक संतों को सड़क पर ही नीचे विराजकर वंदना करते थे।
पैर में माथा लगाकर वंदना करना भक्ति की कितनी बड़ी बात होती है। वन्दना करना भक्ति और विनय का प्रयोग है। आचार्यश्री महाप्रज्ञजी आचार्य बनने के बाद भी अपने आचार्य को (आचार्यश्री तुलसी) को वंदना करके ही प्रवचन में पधारते थे। गुरु को वंदना कर और उनसे आज्ञा प्राप्त कर ही कही जाना आदि बहुत शिष्टता की बात होती है। वन्दना अनेक रूपों में भी हो सकती है। वंदना से जीव नीच गोत्र कर्म का क्षय करता है। जाति, कुल, बल, रूप, तपस्या, लाभ श्रुत, ऐश्वर्य ये भी प्राप्त होते हैं, लेकिन कहा गया कि ये सभी जिसे प्राप्त हो उसे उसका मद नहीं करना चाहिए। जाति से कोई उच्च हो तो उसका घमण्ड नहीं होना चाहिए। बल का भी मद नहीं होना चाहिए। इसी प्रकार रूप, तपस्या, लाभ और ऐश्वर्य के भी अहंकार से बचने का प्रयास होना चाहिए। वन्दना करने से सौभाग्य की प्राप्ति होती है। वन्दना करने वाले के प्रति अनुकूलता रहती है। उसके पुण्य का इतना प्रभाव होता है कि जनता में भी उनका प्रभाव हो जाता है। उनकी लोकप्रियता हो जाती है। उनकी आज्ञा का कोई लंघन नहीं करता। वंदना करने से अहंकार भी क्षीण होता है। विनय की भावना होनी चाहिए। वन्दना करने से स्वयं को भी बहुत लाभ मिलता है। सामान्य रूप से भी वंदन-व्यवहार चलता है। माता-पिता, बड़े भाई, गुरु की वंदना की जाती है। भले कोई ऊंचा पद प्राप्त कर ले, किन्तु वह अपनी मां के सामने तो बेटा ही होता है। यह संसार की भी मानों शिष्ट रीति-रिवाज है। वंदना से निर्जरा का भी लाभ प्राप्त हो सकता है और इससे भी लाभ उठाने का प्रयास होना चाहिए। मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं के उत्तर प्रदान किए।

