सुरेन्द्र मुनोत,ऐसोसिएट एडिटर
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23.06.2026, मंगलवार, लाडनूं ,करीब 37 वर्षों बाद जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के श्रद्धालुओं को योगक्षेम वर्ष का लाभ प्रदान करने वाले तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, महातपस्वी, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने मंगलवार को सुधर्मा सभा में आयोजित प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय ‘दयानुकम्पी रहें’ के माध्यम से मंगल पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि साधु के लिए पांच महाव्रतों के पालन की बात बताई गई। प्रथम अहिंसा महाव्रत है। किसी जीव को नहीं मारना, सभी जीवों के प्रति अहिंसा का भाव रखना यह दया की एक परिभाषा है।
आचार्यश्री भिक्षु ने दया के संदर्भ में बताया कि जीव अपने आयुष्य के आधार पर जीवन जीता है, उसमें हम लोगों की कोई दया नहीं है। कोई मर जाए तो उसकी हिंसा के भागीदार भी आदमी नहीं होता। हां, जो जीवों को मारता है, वह हिंसा का भागीदार होता है। नहीं मारना, यह संकल्प कर लेना, भावना प्रकट कर देना, और इसका पालन करने वाला ही दयावान हो सकता है। यही दया भी होती है। पाप आचरणों से आत्मा की रक्षा करना बहुत बड़ी दया होती है। अपनी आत्मा के साथ-साथ सदुपदेश देकर दूसरों की आत्मा को भी पापों से बचा देना भी दया होती है।
आगम में कहा गया है कि साधु को सभी जीवों के प्रति दया का भाव रखने का प्रयास करना चाहिए। दया का अनुकंपन हो तो कितने जीवों की सुरक्षा हो सकती है। साधु को तो दयानुकंपी होना ही चाहिए। साधु को अपनी आत्मा को पाप आचरणों से बचाने का प्रयास करना चाहिए। साधु का हृदय तो मक्खन के समान कोमल होना चाहिए। साधु में दया और अनुकंपा होनी चाहिए। साधु तो अहिंसा का पुजारी होता है। तन, मन, वचन से साधु किसी को दुःख नहीं देता। साधु तो अभयदानी होता है। उसने तो तीन करण तीन योग से सभी प्रकार के हिंसा का परित्यागी होता है। सभी प्राणियों के प्रति दया और अनुकंपा रखने वाला होता है।
कहा गया है कि जो शांत होता है, वह संत होता है। जिसमें उग्रता हो अथवा उसकी शांतता में कमी है तो ऐसा मानना चाहिए कि या तो उसकी संतता में कमी है अथवा वह संत ही नहीं है। साधु का मुख ही प्रसन्नता का घर होता है। साधना करने वाले होते हैं। तपस्या करने वाले और जीव के कल्याण के लिए उनका मार्गदर्शन भी देने वाले होते हैं। साधु कभी कोप नहीं करते। उनमें करुणा की भावना होती है। संत पुरुषों में तो सहज समता का भाव हो।
आज दिनांक के अनुसार परम पूज्य गुरुदेव आचार्यश्री तुलसी के महाप्रयाण का दिवस है। आज उनके महाप्रयाण को 29 वर्ष पूर्ण होने वाले हैं। कितनों ने उनकी वत्सलता भी देखी होगी। आज के दिन गुरुदेव तेरापंथ न्यास वाले भवन में पधारे थे। कुछ ऐसी स्थिति बनी, जब गुरुदेव का महाप्रयाण हो गया। वे हमारे धर्मसंघ के इतिहास में सर्वाधिक समय तक आचार्य बने रहने वाले आचार्य थे। सबसे छोटी उम्र में युवाचार्य और आचार्य बने। वे एकमात्र ऐसे आचार्य थे, जिन्होंने अपने आचार्य पद का भी विसर्जन कर दिया था। उनके द्वारा कितने-कितने साधु-साध्वियां दीक्षित हुए। उन्होंने कितनों को शिक्षण-प्रशिक्षण प्रदान कर योग्य बनाया। लगभग 60-61 वर्षों तक आचार्यकाल/गणाधिपति काल हुआ था। वे हम सभी को गुरु के रूप में मिले थे। उन्होंने गंगाशहर में अपना प्रवास किया था। जहां उनका समाधिस्थल भी है। हम उनके द्वारा दिखाए गए सत्पथ पर चलने का प्रयास करें। मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं को उत्तरित किया।
दिनांक के अनुसार आचार्यश्री तुलसी के महाप्रयाण दिवस के संदर्भ में बीकानेर अंचल, जहां गंगाशहर में आचार्यश्री तुलसी का समाधि स्थल ‘नैतिकता का शक्तिपीठ’ के नाम से ख्यापित है। उस क्षेत्र से करीब 2000 श्रद्धालु आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में कार्यक्रम के दौरान उपस्थित थे। उपस्थित श्रद्धालुओं की ओर से श्री गणेश बोथरा आदि ने अपनी अभिव्यक्ति दी। उपस्थित श्रद्धालुओं की ओर से सुधर्मा सभा में ही आचार्यश्री तुलसी के जीवनकाल की महत्त्वपूर्ण चित्रों की प्रदर्शनी भी लगाई थी। कार्यक्रम के उपरान्त आचार्यश्री ने उस चित्र प्रदर्शनी का अवलोकन भी किया।

