आहवा, वघई और सुबीर तालुका में कुल 194 दुग्ध मंडलियां में प्रतिवर्ष 2.65 करोड़ लीटर दूध का संग्रहण होता है।
गुजरात,आहवा-डांग
आहवा: ता. 30: गुजरात के अंतिम छोर पर स्थित और पहाड़ी क्षेत्र माने जाने वाला डांग जिला अब प्राकृतिक खेती के साथ-साथ पशुपालन और डेयरी उद्योग में भी तेजी से आगे बढ़ रहा है। डांग जिले में पशुपालन केवल एक व्यवसाय नहीं है, बल्कि यह जिले के आर्थिक परिवर्तन का मुख्य स्रोत बन चुका है।
राज्य सरकार के सघन प्रयासों और ‘वनबंधु कल्याण योजना’ के तहत लागू विभिन्न परियोजनाओं के कारण डांग के दूरदराज गांवों में दूध उत्पादन और पशुपालन एक प्रमुख व्यवसाय के रूप में उभर रहा है।
डांग जिले में डेयरी विकास कार्यक्रम के माध्यम से आर्थिक सशक्तिकरण प्राप्त करने के उद्देश्य से वसुधारा डेयरी के सहयोग से वर्ष 2001 में वघई तथा वर्ष 2007-08 में सुबीर में दुग्ध शीत केंद्रों की स्थापना की गई। आसपास के गांवों में दुग्ध मंडलियों का गठन किया गया। लाभार्थियों को संकर नस्ल की गायें उपलब्ध कराकर दुग्ध मंडलियां शुरू की गईं, जिसके परिणामस्वरूप पिछले 18 वर्षों में डेयरी व्यवसाय से लोगों को अतिरिक्त आय मिलने लगी और धीरे-धीरे उनका डेयरी व्यवसाय की ओर रुझान बढ़ता गया।
वर्तमान में डांग जिले में वसुधारा डेयरी द्वारा संचालित दो दुग्ध शीत केंद्र कार्यरत हैं। इनमें वघई में प्रतिदिन 40,000 लीटर तथा सुबीर में प्रतिदिन 20,000 लीटर क्षमता वाले चिलिंग सेंटर उपलब्ध हैं।
इन डेयरियों में पिछले एक वर्ष (2025-26) के दौरान जिले में गाय और भैंस का कुल 2.65 करोड़ लीटर दूध संग्रहित किया गया। इसके माध्यम से पशुपालकों के घरों तक लगभग 110 करोड़ रुपये की बड़ी राशि दूध आय के रूप में पहुंची है।
जिले में डेयरी उद्योग के विकास में महिलाओं का महत्वपूर्ण योगदान है। डांग में वर्तमान में कुल 194 महिला संचालित दुग्ध मंडलियां कार्यरत हैं। इनमें वघई तालुका में 72, सुबीर तालुका में 63 और आहवा तालुका में 59 मंडलियां शामिल हैं। इनसे कुल 11,017 दूध आपूर्ति करने वाले सदस्य जुड़े हुए हैं। इन मंडलियों के माध्यम से प्रतिदिन 70,000 लीटर दूध एकत्रित किया जाता है, जिससे महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया गया है।
डांग जिले के पशुपालकों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के लिए जिला पंचायत पशुपालन शाखा द्वारा ‘न्यू गुजरात पैटर्न’ के तहत आदिवासी लाभार्थियों को दुधारू पशु खरीद योजना में 185 लाभार्थियों को DBT के माध्यम से 87.88 लाख रुपये की सहायता प्रदान की गई है। विद्युत चाफकटर सहायता योजना के अंतर्गत कुल 21 लाभार्थियों को 3.78 लाख रुपये के स्वीकृति आदेश दिए गए हैं। विधवा, दिव्यांग और सामान्य पशुपालकों को बकरी इकाई स्थापित करने के लिए कुल 29 लाभार्थियों को 17.40 लाख रुपये की सहायता दी गई है। पशु उपचार के लिए जिले में प्रत्येक 10 गांव पर एक के हिसाब से कुल 6 मोबाइल पशु चिकित्सालय शुरू किए गए हैं, जो ‘1962’ टोल फ्री नंबर पर निःशुल्क सेवा प्रदान करते हैं। पशु आहार सहायता के लिए 1496 लाभार्थियों को 59.47 लाख रुपये की लागत से पशु आहार वितरित किया जा रहा है।
चालू वर्ष के लिए राज्य सरकार द्वारा ‘न्यू गुजरात पैटर्न’ आदिवासी/पशुपालन विभाग की विभिन्न योजनाओं के तहत कुल 3.07 करोड़ रुपये की राशि मंजूर की गई है।


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