सुरेंद्र मुनोत, ऐसोसिएट एडिटर
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डीडवाना, डीडवाना-कुचामण (राजस्थान) ,7 अगस्त 2023 को आठ तहसीलों को मिलाकर नागौर जिले से अलग एक नए जिले की घोषणा राजस्थान सरकार ने किया, जिसका नाम डीडवाना-कुचामण रखा गया और उसका मुख्यालय डीडवाना बना। वर्ष 2023 के बाद पहली बार डीडवाना जिला मुख्यालय में जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, महातपस्वी, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी का पदार्पण डीडवानावासियों को मानों विशेष प्रसन्नता प्रदान कर रहा था। नवीन जिला मुख्यालय पर तेरापंथ धर्मसंघ के धर्माधिशास्ता का प्रथम आगमन के संदर्भ में मानों सकल समाज जुटा हुआ था। मानवता के मसीहा के अभिनंदन के लिए सभी मानव अपनी जाति व सांप्रदायिक भेदभाव को भूलकर मानव बन उनकी अभिवंदना को उत्सुक दिखाई दे रहे थे।
सोमवार को प्रातःकाल की मंगल बेला में शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी अपनी धवल सेना के साथ कोलिया से गतिमान हुए। डीडवाना के उत्साही श्रद्धालु अपने आराध्य की अगवानी में कोलिया में ही पहुंचना प्रारम्भ हो गए थे। मार्ग में अनेक गांव के लोगों, स्कूलों के विद्यार्थियों आदि को आचार्यश्री के दर्शन व मंगल आशीर्वाद का लाभ मिला।
जैसे-जैसे आचार्यश्री डीडवाना की सीमा के निकट होते जा रहे थे, उपस्थित श्रद्धालुओं की संख्या व उत्साह दोनों ही बढ़ता जा रहा था। बुलंद जयघोष, बैनर, पोस्टर, होर्डिंग्स, जैन ध्वज आदि उनके उत्साह, श्रद्धा व भक्ति को दर्शा रहे थे। जो अनजान लोग भी थे, भक्तिमान लोगों की भीड़ को देखकर आश्चर्यचकित से निहार रहे थे। इस प्रकार आचार्यश्री के प्रथम पदार्पण के संदर्भ में पूरा शहर महाश्रमणमय नजर आ रहा था।
अपने दोनों करकमलों से श्रद्धालुओं को मंगल आशीष प्रदान करते हुए आचार्यश्री डीडवाना मुख्यालय की सीमा में गतिमान हुए तो मानों लोगों की भीड़ एक विशाल जुलूस में परिवर्तित हो गई। स्थान-स्थान पर विभिन्न समाजों के लोग आचार्यश्री के दर्शन कर मंगल आशीष प्राप्त कर रहे थे। मुस्लिम समाज के लोग भी मानवता के मसीहा की अभिवंदना में करबद्ध खड़े थे। शहर के मुख्य काजी के साथ भी बड़ी संख्या में मुस्लिम समाज के लोगों ने आचार्यश्री का अभिनंदन किया। सभी की भावनाओं को स्वीकार करते और आशीष बांटते हुए लगभग 12 किलोमीटर का विहार कर डीडवाना के अग्रवाल भवन में पधारे, जहां आचार्यश्री का एकदिवसीय प्रवास हुआ।
डीडवाना की धरा पर आयोजित प्रथम मंगल प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित जनता को महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने पावन प्रतिबोध प्रदान करते हुए कहा कि ज्ञान प्रकाश करने वाला होता है। इसलिए आदमी को जितना संभव हो सके, ज्ञान प्राप्ति का प्रयास करना चाहिए। ज्ञान दो प्रकार का होता है-एक लौकिक विद्याओं का ज्ञान और दूसरा अध्यात्म विद्या का ज्ञान। लौकिक विद्याओं में भूगोल, खगोल, गणित, हिन्दी, भाषा आदि-आदि और दूसरी अध्यात्म विद्या के अंदर आत्मा, जीव, शरीर, चेतन, अचेतन, लोक, परलोक, पाप, पुण्य, स्वर्ग-नरक, बंधन, मुक्ति, मोक्ष की जानकारी होती है। अध्यात्म विद्या का ज्ञान प्राचीन ग्रन्थों से भी प्राप्त हो सकता है। एक ज्ञान भीतर से भी उत्पन्न हो जाता है, जिसे अतिन्द्रिय ज्ञान भी कहा जाता है, जो महान साधक, ऋषि, महर्षि को प्राप्त होती है।
पढ़ने से स्वाध्याय होता है और ज्ञान की प्राप्ति होती है। ग्रन्थों, संतों व पंथों का बढ़िया उपयोग हो तो आदमी ज्ञान भी प्राप्त कर सकता है और आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ सकता है। यह धरती का सौभाग्य है कि यहां संत लोग भी मिलते हैं। संतों से सद्ज्ञान की प्राप्ति हो सकती है। आचार्यश्री ने आगे कहा कि हम लोग डीडवाना आए हैं। डीडवाना तो पहले भी अनेक बार आना हुआ है। लाडनूं के पास में ही डीडवाना है। यहां के लोगों के आपसी सद्भाव बना रहे, नैतिकता आदि का विकास हो।
आचार्यश्री के स्वागत में स्वागताध्यक्ष श्री धर्मेन्द्रसिंह मुणोत, श्री सुरेश घोड़ावत ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। स्थानीय तेरापंथ महिला मण्डल ने गीत का संगान किया। श्री सुरेशचंद चौपड़ा ने अपनी भावनाओं को अभिव्यक्ति दी। स्थानीय ज्ञानशाला के ज्ञानार्थियों ने अपनी प्रस्तुति दी। डीडवाना की बहन-बेटियों ने भी आचार्यश्री के स्वागत में अपनी प्रस्तुति दी। अग्रवाल समाज की महिलाओं ने गीत को प्रस्तुति दी। अग्रवाल समाज की ओर से श्री हरिश मोदी आदि सदस्यों ने अभिनंदन पत्र का वाचन करते हुए आचार्यश्री के समक्ष अभिनंदन पत्र अर्पित किया।

