सुरेंद्र मुनोत, ऐसोसिएट एडिटर
कोलिया, डीडवाना-कुचामण (राजस्थान) ,हमें मनुष्य जन्म प्राप्त है। मनुष्य जीवन को दुर्लभ बताया गया है। 84 लाख जीव योनियों में मनुष्य का प्राप्त होना मुश्किल होता है। इस मनुष्य जीवन को यदि पापों और व्यसनों में गवां दिया तो वापस मिलना भी मुश्किल हो सकता है। वर्तमान हम सभी मानव भाग्यशाली हैं जो हमें दुर्लभ मनुष्य जीवन प्राप्त है। इसमें ध्यान देने वाली बात यह है कि आदमी इस जीवन का कैसा उपयोग करता है। इस जीवन में आदमी धर्म, ध्यान, साधना, आराधना करे तो वह मोक्ष को भी प्राप्त कर सकता है। व्यसनों में, गलत कार्यों में, पापों में दुर्लभ मानव जीवन को गंवा देना मूर्खता की बात ही होती है। जैसे किसी आदमी के पास सोने की थाल है और वह उसमें न तो खुद खाता है और न ही किसी अपने मेहमान को खिलाता है, बल्कि उस स्वर्ण थाल से कूड़ा-करकट साफ करता है। इसी प्रकार किसी प्रकार किसी को अमृत प्राप्त हो जाए तो वह उसे पीने के लिए नहीं, बल्कि गंदे पैर को धोने में करता है। इसी प्रकार किसी को चिंतामणि रत्न मिल जाए और वह उसे कौवे को भगाने में पत्थर समझकर फेंक दे तो ये सभी कार्य व्यक्ति की मूर्खता अथवा अज्ञानता के द्योतक हैं। इसी प्रकार जो आदमी प्रमत्त होकर दुर्लभ मानव जीवन को व्यर्थ गंवाता है, वह भी इन्हीं मूर्ख व्यक्तियों की भांति होता है। इसलिए प्राप्त मानव जीवन में आदमी को अपना समय धर्म-ध्यान में लगाने का प्रयास करना चाहिए। लड़ाई-झगड़े से बचने का प्रयास करना चाहिए। परमात्मा का स्मरण, साधुओं की सत्संगति भी करने का प्रयास करना चाहिए। जो व्यर्थ कार्यों में तथा पापाचरणों में समय गंवाता है, वह अधोगति को प्राप्त हो सकता है। अपनी आत्मा के कल्याण के लिए आदमी को अपने जीवन को धर्म से युक्त बनाने का प्रयास करना चाहिए। जीवन अहिंसापूर्ण, संयममय और नशामुक्त रहे। जिस आदमी का जीवन अच्छा होता है तो उसे सद्गति की भी प्राप्ति हो सकती है। उक्त पावन पाथेय जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने कोलिया गांव में स्थित माहेश्वरी भवन परिसर में आयोजित मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित जनता को प्रदान किया। आचार्यश्री ने समुपस्थित ग्रामीणों को सद्भावना, नैतिकता व नशामुक्ति की प्रेरणा प्रदान करते हुए इनके संकल्प भी स्वीकार कराए। इसके पूर्व रविवार को प्रातःकाल की मंगल बेला में जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी ने कैराप से मंगल प्रस्थान किया। मार्ग में अनेकानेक लोगों को शांतिदूत के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ। जन-जन को मंगल आशीष व पावन प्रेरणा प्रदान करते हुए आचार्यश्री कोलिया गांव में स्थित माहेश्वरी भवन में पधारे। आचार्यश्री के मंगल प्रवचन के उपरान्त पूर्व सरपंच समिति सदस्य श्री सूखाराम डेडवारिया, नगरपालिका पाषर्द प्रतिनिधि श्री कमलेश पवार, श्री रामावतार सोनी ने आचार्यश्री के स्वागत में अपनी भावाभिव्यक्ति दी। स्थानीय सिंघी परिवार की ओर से श्री नरेन्द्र सिंघी ने अपनी श्रद्धाभिव्यक्ति दी तथा सिंघी परिवार ने गीत का संगान किया। सरपंच प्रतिनिधि श्री कुशलजी ने भी अपनी अभिव्यक्ति दी। शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी अपनी धवल सेना के साथ सोमवार को डिडवाना में पधारेंगे। इसे लेकर डिडवानावासी श्रद्धालुओं का उत्साह अपने चरम पर है। लाडनूं में स्थित जैन विश्व भारती परिसर में आयोज्य योगक्षेम वर्ष के प्रवेश से पूर्व आचार्यश्री का डिडवाना पदार्पण वहां की जनता के लिए किसी सौभाग्य से कम नहीं है।

